Monday, June 1, 2026

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हाईकोर्ट ने मलेरकोटला जिला अस्पताल में आई.सी.यू. न होने पर तीखी नाराजगी की जाहिर

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने मलेरकोटला जिला अस्पताल में आई.सी.यू. न होने पर तीखी नाराजगी जाहिर करते हुए इसे हैरान करने वाला करार दिया है। इस मामले में चीफ जस्टिस शील नागू की अगुवाई वाली बेंच ने पंजाब सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के सचिव को निर्देश दिया है कि वह पूरे सूबे के सभी जिला अस्पतालों में आई.सी.यू. सुविधाओं की स्थिति पर विस्तृत हलफनामा दाखिल करें।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यह मुद्दा सिर्फ मलेरकोटला तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पंजाब के सभी जिलों के सरकारी अस्पतालों में मुहैया सुविधाओं की न्याविक जांच की जाएगी। सुनवाई दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि मलेरकोटला जिला अस्पताल में आज तक आई.सी.यू. की सुविधा नहीं है, जबकि यह अस्पताल आस-पास के कई इलाकों के लिए रेफरल अस्पताल के रूप में काम करता है।

इस पर बेंच ने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह स्थिति सिर्फ ‘हैरान करने वाली नहीं, बल्कि बेहद चिंताजनक’ है। अदालत ने कहा कि जब किसी जिले का अस्पताल गंभीर और इमरजेंसी मामलों का भार उठाता है तो वहां आई.सी.यू. का न होना सीधे तौर पर लोगों के जीवन से खिलवाड़ के बराबर है।

हाईकोर्ट ने इस मुद्दे को और व्यापक बनाते हुए पंजाब सरकार को यह भी स्पष्ट करने के लिए कहा कि आखिर क्यों हर जिला अस्पताल में सी.टी. स्कैन और एम.आर.आई. मशीनों को लाजमी नहीं बनाया जाना चाहिए। अदालत ने सूबे वरत से पेश आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि पंजाब के 23 जिलों में से सिर्फ 6 जिलों में ही एम.आर.आई. मशीनें मुहैया हैं, जो बेहद दयनीय स्थिति को दर्शाता है। बेंच ने कहा कि जिला अस्पतालों पर भारी आबादी और गंभीर मरीजों का दबाव रहता है।

इसलिए आधुनिक जांच सुविधाओं की कमी सीधे तौर पर इलाज की गुणवत्ता को प्रभावित करती है। अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि इस मामले में अब तक दाखिल किए गए सप्लीमेंट्री हलफनामे संतोषजनक नहीं हैं।बेंच ने कहा कि एक बहुत जूनियर अधिकारी वरत से दाखिल हलफनामे पर वह भरोसा नहीं कर सकते, इसलिए अगला हलफनामा जरूरी रूप से स्वास्थ्य विभाग के सचिव वरत से ही दाखिल किया जाए।

यह मामला भीषम किंगर वरत से दाखिल जनहित याचिका से जुड़ा है, जिसमें मलेरकोटला सिविल अस्पताल में भारतीय स्वास्थ्य मानकों की उल्लंघना का दोष लगाया गया है। याचिका में कहा गया है कि रेफरल अस्पताल होने के बावजूद यहां आई.सी.यू. समेत कई जरूरी सुविधाएं मौजूद नहीं हैं।

हाईकोर्ट ने सूबा सरकार वरत से सी.टी. स्कैन और एम.आर.आई. जैसी सेवाओं को निजी प्रयोगशालाओं को आउटसोर्स करने पर भी सवाल उठाए। बेंच ने कहा कि जनता को बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं देना सूबे की जिम्मेदारी है और आधुनिक समय में सी.टी. स्कैन और एम.आर.आई. जैसी सुविधाएं अब लाजमी बन चुकी हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि जिला और सब डिवीजन स्तर के अस्पतालों में ये सुविधाएं होना जरूरी है।

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