Tuesday, June 2, 2026

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अलविदा जाकिर हुसैन: मां ने माना मनहूस, जीता ‘सेक्सी मैन’ का खिताब; जानिए तबला उस्ताद के अनसुने किस्से

NRI SANJH JALANDHAR (16 DECEMBER )

दिग्गज तबलावादक जाकिर हुसैन अब इस दुनिया में नहीं हैं। 73 साल की उम्र में उन्होंने रविवार(16 दिसंबर) की रात अमेरिका के सैन फ्रांसिस्को में अंतिम सांस ली। फेंफड़ों की गंभीर बीमारी से जूझ रहे जाकिर के निधन से संगीत जगत स्तब्ध  है। जब जाकिर हुसैन का जन्म हुआ तो उन्हें उनकी ही मां मनहूस समझने लगी थे। वहीं,  ऐसा वक्त भी आया जब जाकिर उसने ने फिल्मी सितारों को पीछे छोड़ ‘सेक्सी मैन’ का खिताब हासिल किया। आइए, जानते हैं तबला उस्ताद जाकिर हुसैन की जिंदगी से जुड़े दिलचस्प किस्से। 

इडियोपैथिक पल्मोनरी फाइब्रोसिस बीमारी से जूझ रहे थे
जाकिर हुसैन का निधन भारतीय शास्त्रीय संगीत के लिए एक अपूरणीय क्षति है। वह लंबे समय से इडियोपैथिक पल्मोनरी फाइब्रोसिस बीमारी से जूझ रहे थे। अमेरिका के सैन फ्रैंसिस्को के एक निजी अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था, जहां उन्होंने अंतिम सांस ली। पद्म विभूषण से सम्मानित जाकिर ने तबले पर अपनी अद्वितीय शैली से पूरे विश्व में भारत का नाम रोशन किया। उनकी उंगलियों का जादू अब भी संगीत प्रेमियों के दिलों में गूंजता है।  

जब मां ने ही मान लिया मनहूस
जाकिर हुसैन ने नसरीन मुन्नी कबीर की किताब ‘जाकिर हुसैन- एक संगीतमय जीवन’ में खुद अपने बचपन का एक किस्सा साझा किया है। इसमें किताब में लिखा है कि जब जाकिर हुसैना का जन्म हुआ तो उनके पिता दिल की बीमारी से अक्सर तकलीफ में रहने लगे। इसी दौरान घर में आर्थिक तंगी भी शुरू हो गई। जाकिर की मां इन सब चीजों से परेशान रहने लगीं। इसी दौरान किसी ने जाकिर की मां से कह दिया कि बच्चा मनहूस है। उनकी मां के दिमाग में यह बात घर कर गई। उसके बाद मां ने जाकिर को दूध पिलाना बंद कर दिया। परिवार के एक करीबी ने जाकिर को पालने की जिम्मेदारी उठाई।

अमिताभ को पीछे छोड़ जीता ‘सेक्सी मैन’ का खिताब 
जाकिर हुसैन का हैंडसम लुक और घुंघराले बाल उनकी पहचान थे। 1994 में भारतीय पत्रिका “जेंटलमैन” ने उन्हें ‘सबसे सेक्सी मैन’ का खिताब दिया। इस प्रतियोगिता में उन्होंने अमिताभ बच्चन जैसे दिग्गजों को भी पीछे छोड़ दिया। जाकिर ने बताया था कि मैगजीन वालों को यह यकीन नहीं हो रहा था कि वह अमिताभ बच्चन से ज्यादा वोट पाकर जीत सकते हैं। यह उनके व्यक्तित्व की खासियत थी कि वे पारंपरिक और आधुनिक दोनों रूपों में दिलों पर राज करते थे।  

पैदा होते ही पिता ने सुनाई तबले की ताल
9 मार्च 1951 का दिन भारतीय संगीत के इतिहास में अमिट छाप छोड़ने वाला था, क्योंकि इस दिन उस्ताद अल्लारक्खा के घर जाकिर हुसैन का जन्म हुआ था। उस्ताद अल्लारक्खा, जो स्वयं एक प्रसिद्ध तबला वादक थे, ने अपनी संतान को ‘ताल’ और ‘संगीत’ के संस्कार दिए। जब जाकिर हुसैन को जन्म लिया, तो उनके पिता ने उसे आशीर्वाद नहीं, बल्कि तबले की तालें दीं। उन्हें कान में तबले की ताल सुनाई। यही तालें उनके जीवन का पहला ‘आशीर्वाद’ बनीं और उनकी पहचान का हिस्सा बन गईं। जाकिर हुसैन ने तबले को एक वैश्विक पहचान दिलाई।

महज 3 साल की उम्र से शुरू किया तबला बजाना
जाकिर हुसैन ने संगीत के क्षेत्र में अपनी कड़ी मेहनत से एक विशेष स्थान बना लिया। बचपन में जब वह महज 3 साल के थे, तब से उन्होंने तबला बजाना शुरू किया और फिर यह उनकी जीवनशैली बन गई। जाकिर हुसैन ने उस्ताद अल्लारक्खा से शुरुआत की, और उस्ताद लतीफ अहमद खान और उस्ताद विलायत हुसैन खान से भी तबले की तालीम ली। भारत में पहला प्रोफेशन शो 12 साल की उम्र में किया। इस शो के लिए जाकिर हुसैन को 100 रुपए मिले थे, जो उस समय के हिसाब से काफी अच्छी फीस थी।

ग्लोबल म्यूजिक में फ्यूजन संगीत से बनाई जगह
भारत में अपने शास्त्रीय संगीत की मजबूत पकड़ बनाने के बाद, जाकिर हुसैन ने पश्चिमी संगीत के साथ मिलकर फ्यूजन संगीत की शुरुआत की। उनका बैंड ‘शक्ति’ इस दिशा में एक बड़ा कदम था। जाकिर हुसैन ने मिकी हार्ट, जॉन मैक्लॉफ्लिन जैसे कलाकारों के साथ मिलकर फ्यूजन संगीत में योगदान दिया। उनका उद्देश्य भारतीय और पश्चिमी संगीत को एक साथ लाकर एक नया संगीत अनुभव देना था, और उन्होंने इसे पूरी दुनिया में सफलतापूर्वक पेश किया। जाकिर हुसैन पश्चिमी संगीत की दुनिया में भी सम्मानित हुए और दुनिया भर में भारतीय संगीत को फैलाने में अहम भूमिका निभाई।

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