बड़ी खबरः केजरीवाल की बेल पर रोक मामले में अबतक का सबसे बड़ा खुलासा, जानकर आपके भी उड़ जाएंगे होश

NRI SANJH JALANDHAR (5 JULY)

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दिल्ली आबकारी घोटाले (Delhi Excise Scam) के मनी लॉन्ड्रिंग मामले में जेल में बंद सीएम अरविंद केजरीवाल की बेल पर रोक लगाने वाले मामले में अबतक का सबसे बड़ा खुलासा हुआ है। दरअसल केजरीवाल की बेल पर रोक लगाने वाले दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) के जज और Ed के वकील सगे भाई हैं। ये दावा वकीलों ने किया है। इसे लेकर150 वकीलों ने CJI चंद्रचूड़ (CJI Chandrachud) को चिट्ठी लिखकर चिंता जताई है। कीलों ने गुरुवार (4 जुलाई, 2024) को सीजेआई चंद्रचूड़ को यह खत लिखा और हितों के टकराव का मुद्दा उठाया है।

वकीलों ने पत्र में दावा किया है कि हाई कोर्ट जज जस्टिस सुधीर कुमार जैन और हाई कोर्ट में ED की वकालत कर रहे अनुराग जैन दोनों आपस में सगे भाई हैं। ऐसे में दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश सुधीर कुमार जैन को मनी लॉन्ड्रिंग के एक मामले में अरविंद केजरीवाल को बेल दिए जाने के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ED) की अपील पर सुनवाई से खुद को अलग कर लेना चाहिए था।

यह प्रतिवेदन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह राउज एवेन्यू कोर्ट की अवकाशकालीन न्यायाधीश न्याय बिंदु के उस आदेश को लेकर भेजा गया है, जिसमें उन्होंने 20 जून को अरविंद केजरीवाल को दी थी और बाद में ईडी की अपील पर दिल्ली हाईकोर्ट ने जमानत आदेश पर रोक लगा दी थी। इसमें कहा गया, ‘हम दिल्ली उच्च न्यायालय और दिल्ली की जिला अदालतों में देखी जा रही कुछ अभूतपूर्व प्रथाओं के संबंध में कानूनी बिरादरी की ओर से यह (पत्र) लिख रहे हैं…’

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के कथन का भी जिक्र

वकीलों ने कहा कि अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश बिंदु ने केजरीवाल को जमानत देते हुए उन्होंने प्रधान न्यायाधीश के इस कथन का भी जिक्र किया, जिसमें कहा गया है कि अधीनस्थ अदालतों को शीघ्र और साहसिक निर्णय लेने की आवश्यकता है, ताकि हाईकोर्ट में मामलों का बोझ न पड़े। प्रतिवेदन में कहा गया कि अगले ही दिन ईडी ने इस आदेश को दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दे दी। इस चुनौती को बेहद अनियमित बनाने वाली बात यह है कि यह चुनौती राउज एवेन्यू अदालत के आदेश को (वेबसाइट पर) अपलोड किए जाने से पहले ही दी गई थी।

इस प्रतिवेदन पर आम आदमी पार्टी (AAP) के विधि प्रकोष्ठ के प्रमुख वकील संजीव नासियार के हस्ताक्षर भी हैं। हाईकोर्ट द्वारा निचली अदालत के जमानत आदेश को तत्काल सूचीबद्ध करने, सुनवाई करने और स्थगन लगाने का उल्लेख करते हुए प्रतिवेदन में कहा गया है, ‘भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में ऐसा पहले कभी नहीं देखा गया है और इसने कानूनी बिरादरी के मन में गहरी चिंता पैदा कर दी है।

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