Monday, April 20, 2026

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नवरात्रि विशेष: यहां गिरी थीं माता सती की आंखें, 51 शक्तिपीठों में से एक, जहां मां नैना करती है हर मनोकामना पूरी

NRI SANJH JALANDHAR (23 SEPTEMBER)

उत्तराखंड का नैनीताल अपनी प्राकृतिक सुंदरता, ठंडी हवाओं और झीलों की वजह से पूरी दुनिया में जाना जाता है. झीलों के इस शहर की पहचान केवल पहाड़ों और झीलों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यहां का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व भी उतना ही गहरा है. इन्हीं धार्मिक धरोहरों में से एक है मां नैना देवी मंदिर, जो नैनी झील के उत्तरी छोर पर स्थित है।

यह मंदिर न केवल स्थानीय निवासियों की आस्था का केंद्र है, बल्कि यहां आने वाले हर पर्यटक के लिए भी श्रद्धा और विश्वास का स्थल है. हर साल हजारों श्रद्धालु और पर्यटक इस मंदिर में पहुंचते हैं. कोई यहां मनोकामना पूरी करने आता है, कोई जीवन की कठिनाइयों से मुक्ति की कामना करता है, तो कोई सिर्फ इस जगह की आध्यात्मिक शांति का अनुभव करने।

मंदिर का इतिहास (Navratri Special, Naina Devi Temple)

नैना देवी मंदिर का इतिहास पुराणों और किंवदंतियों से जुड़ा हुआ है. शिव पुराण और अन्य धार्मिक ग्रंथों में वर्णन है कि जब राजा दक्ष के यज्ञ में माता सती ने अपने प्राण त्याग दिए, तब भगवान शिव दुःख से व्याकुल होकर उनके शरीर को लेकर ब्रह्मांड में विचरण करने लगे. भगवान विष्णु ने सृष्टि की रक्षा के लिए अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के अंगों को खंडित किया।

किंवदंती के अनुसार, माता सती की दोनों आँखें (नयन) इस स्थान पर गिरी थीं. इसी कारण इस स्थल का नाम “नैना देवी” पड़ा. यहां पर सबसे पहले ग्रामीणों ने एक छोटा सा मंदिर बनाया. समय के साथ यह मंदिर श्रद्धालुओं का बड़ा केंद्र बन गया और धीरे-धीरे इसका स्वरूप भव्य होता गया।

सन् 1880 में नैनीताल में जब भयंकर भूकंप आया, तब मंदिर को काफी क्षति पहुँची. बाद में स्थानीय लोगों और प्रशासन के सहयोग से मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया. वर्तमान स्वरूप में मंदिर आकर्षक शिखर, विस्तृत प्रांगण और सुव्यवस्थित पूजा स्थल के रूप में स्थापित है।

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