Monday, September 21, 2026

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ट्रंप के ‘चांद हमारा है’ वाले बयान के बाद उठ रहे सवाल !

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 6 सितंबर को ‘ट्रुथ सोशल’ पर एक पोस्ट किया, जिसमें उन्होंने दावा किया कि चांद हमारा है. इस पोस्ट के साथ अमेरिकी झंडे वाली चांद की सतह की एक तस्वीर और यूएस स्पेस फोर्स व एआई (AI) से बनी तस्वीरों वाले कई अन्य पोस्ट भी शामिल थे।

चांद की खोज के मामले में अमेरिका दुनिया के प्रमुख देशों में से एक है, लेकिन यह दावा आधी सदी से भी ज्यादा समय से चले आ रहे अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ है, जिसके अनुसार अमेरिका समेत कोई भी देश चांद का मालिक नहीं बन सकताइससे जुड़ा मुख्य कानून 1967 की ‘आउटर स्पेस ट्रीटी’ है, जिस पर शीत युद्ध के दौरान अमेरिका के समर्थन से सहमति बनी थी।

इसके सिद्धांत संप्रभुता के मामले में तो बिल्कुल साफ हैं, लेकिन एक सवाल ऐसा है जो अब तक अनसुलझा है और व्यावसायिक नजरिए से बहुत जरूरी है. क्या कोई देश या कंपनी चांद की सतह से निकाले गए संसाधनों की मालिक हो सकती है?इस संधि का आर्केल II कहता है कि बाहरी अंतरिक्ष, जिसमें चांद और दूसरे खगोलीय पिंड शामिल हैं, पर संप्रभुता, कब्ज़े या किसी अन्य तरीके से किसी भी देश का अधिकार नहीं हो सकता।

चांद की सतह पर झंडा लगाने, बेस बनाने या किसी खास हिस्से का इस्तेमाल करने से उस इलाके पर किसी देश का कानूनी हक नहीं हो जाता.वहीं, आर्केल I एक व्यापक सिद्धांत प्रस्तुत करता है, जिसमें कहा गया है बाहरी अंतरिक्ष की खोज और उसका इस्तेमाल सभी देशों के हित में होना चाहिए, और हर देश को समान रूप से इसकी खोज करने और इसका उपयोग करने की आज़ादी होनी चाहिए

यह संधि देशों को उनकी सरकारी एजेंसियों और उनके अधिकार-क्षेत्र में काम करने वाली किसी भी निजी संस्था द्वारा की जाने वाली अंतरिक्ष गतिविधियों के लिए भी जिम्मेदार ठहराती है1979 की एक अन्य संयुक्त राष्ट्र संधि, ‘मून एग्रीमेंट’ कमर्शियल माइनिंग के मुद्दे पर सीधे बात करती है और चांद व उसके संसाधनों को “पूरी मानवता की साझा विरासत” घोषित करती है।

‘आर्टेमिस एकॉर्ड्स’ के विपरीत, यह समझौता किसी भी देश या कंपनी को चांद के उन संसाधनों का मालिक बनने से रोकता है जिनका अभी तक खनन नहीं हुआ है. साथ ही, यह अनिवार्य बनाता है कि कमर्शियल माइनिंग का प्रबंधन एक अंतरराष्ट्रीय संस्था द्वारा किया जाए, ताकि उससे मिलने वाले मुनाफ़े और वैज्ञानिक फायदों को सभी देशों के बीच बराबरी से बांटा जा सके।

हालांकि, ‘आउटर स्पेस ट्रीटी’ की तुलना में ‘मून एग्रीमेंट’ पर बहुत कम देशों ने हस्ताक्षर किए हैं और इसमें दुनिया की प्रमुख अंतरिक्ष शक्तियां शामिल नहीं हैं. उदाहरण के लिए, अमेरिका ने इसे स्वीकार नहीं किया है. यही सीमित भागीदारी एक बड़ी वजह है कि कमर्शियल लूनर माइनिंग को लेकर कानूनी बहस आज तक अनसुलझी है।

अंतरिक्ष कानून उस संसाधन और उस भू-भाग के बीच स्पष्ट अंतर करता है जिसे पहले ही निकाला जा चुका है. ‘आउटर स्पेस ट्रीटी’ के तहत चांद के किसी भी हिस्से का मालिकाना हक नहीं मिल सकता, लेकिन इसमें ऐसा कोई कमर्शियल माइनिंग कोड नहीं है जो यह बताए कि ज़मीन से निकाले जाने के बाद मिनरल, पानी या अन्य चीज़ों का असली मालिक कौन होगा।

यही वजह है कि इस पर विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है:पहली राय: यदि गतिविधियां अंतरराष्ट्रीय कानूनों के दायरे में रहकर की जाएं, तो चांद की सामग्री को निकालना और अपने पास रखना उस पर अपना भू-भागीय अधिकार जताने जैसा नहीं है.दूसरी राय: यदि देशों या कंपनियों को संसाधनों का कमर्शियल इस्तेमाल करने की पूरी छूट दे दी जाए, तो इससे संधि का वह मूल सिद्धांत कमज़ोर हो सकता है

जिसके अनुसार अंतरिक्ष का इस्तेमाल पूरी मानवता के फ़ायदे के लिए होना चाहिए.यह कानूनी अनिश्चितता इसलिए भी अहम है क्योंकि चांद के संसाधनों की व्यावहारिक उपयोगिता बहुत ज़्यादा है. चांद के ध्रुवों के पास हमेशा छाया में रहने वाले इलाकों में मौजूद पानी की बर्फ़ को पीने के पानी, ऑक्सीजन और हाइड्रोजन-आधारित रॉकेट ईंधन (प्रोपेलेंट) में बदला जा सकता है।

भविष्य में चांद पर बनने वाले बुनियादी ढांचों के लिए खनिज और धातुएं बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकती हैं. हालांकि, बड़े पैमाने पर माइनिंग के लिए ज़रूरी आधुनिक तकनीक और उसकी अर्थशास्त्र अभी भी पूरी तरह विकसित नहीं हो पाई है.चांद से जुड़े कानूनी नियम उस दौर में बने थे जब अंतरिक्ष की खोज मुख्य रूप से सरकारों का काम हुआ करता था और इसमें मुख्य रूप से अमेरिका तथा सोवियत संघ के बीच होड़ थी।

आज अंतरिक्ष की अर्थव्यवस्था में बहुत ज़्यादा भीड़ और प्रतिस्पर्धा है; इसमें सरकारें, कमर्शियल रॉकेट लॉन्च करने वाली कंपनियाँ, प्राइवेट स्पेसक्राफ्ट कंपनियां और भविष्य में संसाधन निकालने की योजना बनाने वाली कंपनियां शामिल हैंइस बदलाव ने ऐसे कई नए सवाल खड़े किए हैं

जिनका जवाब शुरुआती समझौतों में विस्तार से नहीं दिया गया था जैसे कि माइनिंग का दायरा कितना बड़ा हो सकता है, अलग-अलग मिशन संसाधन वाले इलाकों को आपस में कैसे साझा कर सकते हैं, आपसी विवादों को कैसे सुलझाया जाएगा, और किस सीमा तक दखलंदाज़ी रोकने के लिए बनाया गया “सेफ़्टी ज़ोन” एक तरह से खास अधिकार या नियंत्रण में बदल जाता है

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