Friday, September 25, 2026

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चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग तीन दिवसीय उच्चस्तरीय द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन के लिए अमेरिका पहुंचे

चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग अपने अमेरिकी समकक्षी डोनाल्ड ट्रंप के साथ तीन दिवसीय उच्चस्तरीय द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन के लिए वॉशिंगटन डी.सी. पहुंच चुके हैं. 23 सितंबर से 25 सितंबर 2026 तक चलने वाली यह राजकीय यात्रा एक दशक से भी अधिक समय में राष्ट्रपति शी की अमेरिकी राजधानी की पहली यात्रा है

साथ ही, साल 2026 में दोनों शीर्ष नेताओं के बीच यह दूसरी सीधी मुलाकात है।यह समिट ऐसे समय में हो रही है जब दुनिया की दो सबसे बड़ी आर्थिक और सैन्य महाशक्तियां व्यापारिक विवादों, तकनीकी प्रतिस्पर्धा, ताइवान को लेकर बढ़ते तनाव और मध्य पूर्व के जटिल भू-राजनीतिक संकटों से जूझ रही है।

यही वजह है कि पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय और वैश्विक बाजारों की नजरें व्हाइट हाउस में हो रही इस ऐतिहासिक वार्ता पर टिकी है।द्विपक्षीय वार्ता में व्यापार सबसे प्राथमिकता वाला मुद्दा बना हुआ है. वर्तमान में दोनों देश एक अस्थाई व्यापारिक युद्धविराम के तहत काम कर रहे हैं, जिसकी समयसीमा 10 नवंबर 2026 को समाप्त हो रही है।

.इस समझौते ने दोनों देशों के बीच उस भीषण ट्रेड-वॉर को रोक रखा था जो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के लिए बड़ा खतरा बन गया था.वार्ता की पृष्ठभूमि तैयार करने के लिए चीनी उप-प्रधानमंत्री हे लिफेंग और अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के बीच बैठकों का दौर जारी है. अमेरिका ने संकेत दिए हैं कि आगामी घोषणाएं मुख्य रूप से कृषि व्यापार और गैर-टैरिफ बाधाओं को कम करने पर केंद्रित हो सकती है।

इससे चीन द्वारा अमेरिकी कृषि उत्पादों पर आयात शुल्क घटाने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है. हालांकि, व्यापारिक असंतुलन जैसे गहरे संरचनात्मक मुद्दों पर स्थायी सहमति बनाना अब भी एक बड़ी चुनौती है।अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता से जुड़े कई मुद्दे इस वार्ता के केंद्र में हैं. अमेरिका ने ईरान से चीन की भारी तेल खरीद और आर्थिक संबंधों पर चिंता जताई है।

वॉशिंगटन का मानना है कि बीजिंग तेहरान पर अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर स्थिति शांत कर सकता है, हालांकि राष्ट्रपति शी ने इसमें सीधी भूमिका निभाने से परहेज किया है.ताइवान इस शिखर सम्मेलन पर बारीक नजर बनाए हुए है।

एशियाई सहयोगियों को आशंका है कि व्यापारिक या आर्थिक लाभ पाने के चक्कर में अमेरिका, ताइवान को दी जाने वाली सैन्य सहायता या कूटनीतिक समर्थन में ढील न दे दे. अमेरिका द्वारा ताइवान नीति में कोई भी बड़ा बदलाव अमेरिकी कांग्रेस के भीतर भारी विरोध पैदा कर सकता है

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