Friday, June 5, 2026

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रिजर्व बैंक ने रेपो रेट को 5.5% पर स्थिर रखने का ऐलान किया

भारतीय रिजर्व बैंक की मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी (MPC) ने आज बड़ा फैसला लेते हुए रेपो रेट को 5.5% पर स्थिर रखने का ऐलान किया है. यह फैसला कमेटी में शामिल सभी सदस्यों की सर्वसम्मति से लिया गया है, जिसकी अगुवाई RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने की. साथ ही चालू वित्त वर्ष (FY27) के लिए देश की रियल जीडीपी ग्रोथ रेट का अनुमान 6.9% से घटाकर 6.6% कर दिया।

रिजर्व बैंक ने वैश्विक अनिश्चतताओं को देखते हुए आर्थिक रफ्तार को थोड़ा धीमा आंका है. अमेरिका-ईरान में जारी युद्ध और तनाव के चलते ग्लोबल सप्लाई चेन के प्रभावित होने का जोखिम बढ़ गया है.अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और अन्य जरूरी कंपोनेंट्स के दाम बढ़ने से आर्थिक विकास पर थोड़ा ब्रेक लग सकता है. देश में मानसून और कृषि उत्पादन को लेकर बने जोखिमों को भी इस कटौती का आधार बनाया गया है।

पिछले साल (जनवरी 2025 से लेकर आज जून 2026 तक) भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने रेपो रेट में कुल 4 बार बदलाव किया है. इस दौरान दरों को 6.50% से घटाकर 5.25% पर लाया गया है, जिससे कुल मिलाकर 1.25% (125 बेसिस पॉइंट्स) की बड़ी राहत मिली है. इस दौरान पहले फरवरी 2025 में रेपो रेट में 0.25 परसेंट की पहली कटौती की गई. उसके बाद अप्रैल में भी 0.25% रेट घटाए गए. पिछले साल जून में 50% की बड़ी कटौती की गई थी. फिर दिसंबर में 0.25 परसेंट की और कमी लाई गई।

इस साल फरवरी में हुई बैठक में दरों में कोई बदलाव नहीं किया था. पो रेट को 5.25% पर बरकरार रखने के फैसले से अब लोन की EMI नहीं बढ़ेगी। यानी कि आपके होम लोन, कार लोन या पर्सनल लोन की मासिक किस्त में कोई बढ़ोतरी नहीं होगी। • नया लोन लेने में भी आसानी होगी

अगर आप नया घर या गाड़ी लेने के लिए लोन लेने का सोच रहे हैं, तो आपको बैंकों से पुराने कम रेट पर ही लोन मिल जाएगा।इससे फिक्स्ड डिपॉजिट पर भी बढ़िया कमाई होगी क्योंकि बैंकों द्वारा सीनिसर सिटीजन्स और आम नागरिकों को दी जा रही FD की ब्याज दरें फिलहाल कम नहीं होंगी और निवेशकों को ऊंचे रिटर्न का फायदा मिलता रहेगा.।आरबीआई के इस फैसले से इकोनॉमी को भी मजबूती मिलेगी क्योंकि ब्याज दरें बढ़ने का डर खत्म होने से बाजार में घरों और नई गाड़ियों की डिमांड बढ़ेगी. इससे प्रॉपर्टी और ऑटोमोबाइल सेक्टर को रफ्तार मिलेगी।

रेट को स्थिर रखकर एक तरफ आरबीआई देश की आर्थिक रफ्तार को बनाए रखता है और दूसरी तरफ पश्चिम एशिया में जारी संकट की वजह से कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों पर भी नजर रख पाता है।

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