अमेरिका ने वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (WHO) से औपचारिक रूप से अलग होने की प्रक्रिया पूरी कर ली है।यह फैसला राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के पहले दिन से शुरू हुआ था और अब 22 जनवरी 2026 को पूरा हो गया है।ट्रंप प्रशासन ने 20 जनवरी 2025 को एक कार्यकारी आदेश जारी करके WHO से बाहर निकलने की घोषणा की थी।
इसके तहत अमेरिका ने WHO की सारी फंडिंग बंद कर दी, अपने सभी कर्मचारियों और ठेकेदारों को जिनेवा मुख्यालय और दुनिया भर के WHO दफ्तरों से वापस बुला लिया।अब अमेरिका WHO का सदस्य नहीं रहा। जिनेवा स्थित WHO मुख्यालय के बाहर से अमेरिकी झंडा भी हटा दिया गया है।
ट्रंप सरकार का कहना है कि WHO ने कोविड-19 महामारी को संभालने में बड़ी गलतियां कीं. संगठन ने जरूरी सुधार नहीं किए और कुछ सदस्य देशों के राजनीतिक दबाव में आकर काम किया। अमेरिका अब WHO के साथ सिर्फ सीमित संपर्क रखेगा ताकि अलग होने की प्रक्रिया पूरी हो सके।
सरकार ने साफ कहा है कि अमेरिका भविष्य में WHO में वापस नहीं लौटेगा।WHO एमपॉक्स, इबोला और पोलियो जैसी बीमारियों से लड़ने के लिए दुनिया भर में कोऑर्डिनेशन करता है. गरीब देशों को तकनीकी मदद, वैक्सीन और दवाओं का वितरण करता है. सैकड़ों बीमारियों के लिए गाइडलाइंस बनाता है।इस फैसले से वैश्विक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है।
एक्सपर्ट्स का कहना है कि इससे नई बीमारियों से लड़ने की वैश्विक क्षमता कमजोर होगी। अमेरिकी वैज्ञानिकों और दवा कंपनियों को भी दूसरे देशों से हेल्थ डेटा मिलना मुश्किल होगा, जो महामारी की शुरुआती चेतावनी के लिए जरूरी है. जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी के एक्सपर्ट्स लॉरेंस गोस्टिन ने इसे ‘अपने जीवन का सबसे विनाशकारी राष्ट्रपति फैसला’ बताया है।


